Sunday, 23 November 2025

Life...

जीवन आपल्याला नेहमी दोन प्रकारची माणसं दाखवतं—
 एक, जी आपल्या प्रकाशात चमकतात,
 आणि दुसरी, जी आपल्या अंधारात आपल्याला धरून ठेवतात.
सुखाच्या दिवसांत आपल्याभोवती अनेक चेहरे दिसतात.
 हसणारे, आपुलकी दाखवणारे, सतत सोबत राहणारे.
 त्या सर्वांत एक प्रकारचं आकर्षण असतं,
 कारण त्या काळात आपण उपयोगी असतो—
 एखाद्या ओळखीमुळे, एखाद्या मदतीमुळे,
 किंवा आपल्याकडून मिळणाऱ्या फायद्यामुळे.
मात्र हा सारा गोंगाट तात्पुरता असतो.
 यश, पैसा, प्रतिष्ठा या सर्वांभोवती फिरणारी माणसं
 शक्यतो आपल्या मनापर्यंत कधीच पोहोचत नाहीत.
 ती आपल्या आयुष्यात “सोबत” म्हणून असतात,
 पण “आपली” म्हणून नसतात.
अवघड दिवस हा आयुष्याचा सर्वात मोठा सत्यचाचणी असतो.
 परिस्थिती थोडी उलटी झाली की
 जगाचा आपल्याकडे पाहण्याचा नजरेचा कोन बदलतो.
 काहीचे फोन येणे बंद होते,
 काहींची काळजी कमी होते,
 आणि काही लोक तर आपल्याला टाळू लागतात.
अचानक लक्षात येतं—
 जे चेहरे कधी आपल्या यशात पहिल्या रांगेत उभे होते,
 तेच आता आपल्या अडचणींमध्ये दिसतही नाहीत.
आणि याच क्षणी एक गहन सत्य मनाला टोचते—
 जी माणसं परिस्थितीनुसार बदलतात,
 ती कधीही आपल्या आयुष्याचा आधार बनू शकत नाहीत.
पण आश्चर्य म्हणजे, काही मोजकी माणसं
 कुठल्याही कारणाशिवाय आपल्या बाजूला उभी असतात.
 त्यांना तुमची ताकद दिसत नाही,
 तुमची ओळख महत्त्वाची वाटत नाही,
 तुमचा पैसा त्यांच्या दृष्टीने कधीच निर्णायक नसतो.
त्यांना फक्त तुमचं मन दिसतं.
 तुमच्या शांत वेदना कळतात,
 तुम्ही न बोलताही तुमची अवस्था समजते,
 आणि त्यांना तुमचं माणूसपण प्रिय असतं.
हीच माणसं आपल्या आयुष्याची खरी मालमत्ता असतात.
 ती कमी असतात,
 पण त्यांची किंमत अपरिमित असते.
🌱 खोल जीवनशिकवण
जग तुमच्या यशाने प्रभावित होतं,
 पण जगण्यासाठी तुम्हाला तुमचं असणारं मन लागतं.
परिस्थितीनुसार बदलणारे लोक दूर ठेवावेत,
 आणि कोणत्याही परिस्थितीत न बदलणारे जपावेत.
आपली किंमत ओळखणारी माणसं शोधा,
 आणि आपला उपयोग करणाऱ्यांपासून दूर राहा.
ज्यांना तुमची गरज नसताना तुम्ही महत्त्वाचे आहात,
 तेच तुमचे खरे आहेत.
खरी सोबत आवाज करत नाही;
 ती शांतपणे तुमच्यासोबत उभी राहते.

Wednesday, 19 November 2025

💔 पत्थर नहीं, इंसान हूँ मैं: ज़िम्मेदारियों का अनंत भार

१९ नवंबर है। बाहर सुबह की धीमी, ठंडी हवा चल रही है, और शहर एक गहरी, अनजानी खामोशी में डूबा है। यह खामोशी उन अनगिनत कहानियों की है जो हर रोज़, हर पुरुष अपने सीने में दफ़न कर देता है।
सुबह-सुबह मेरी एक दोस्त का मैसेज आया: "हैप्पी इंटरनेशनल मेन्स डे।"
हैरानी नहीं हुई कि मुझे यह दिन याद नहीं था। हमें कहाँ याद रहती हैं ऐसी छोटी-मोटी तारीखें? हमारे दिमाग में तो ज़िम्मेदारियों का शोर इतना ज़्यादा है कि उत्सवों की हल्की आवाज़ दब जाती है। पेट खाली हो तो भूख याद रहती है, दिमाग खाली हो तो बाकी चीज़ें याद आती हैं। हमारा दिमाग तो बचपन से ही ज़िम्मेदारियों के बोझ से भरा पड़ा है।
बचपन की अदृश्य बेड़ियाँ
मुझे याद है, जब घर में लड़का पैदा होता है, तो खुशी से पेढ़े बाँटे जाते हैं—'वंश का दीपक' आया है। पर किसी को नहीं पता कि इस दीपक को आगे जाकर कितने तूफ़ानों से अकेले लड़ना है।
बचपन में जब मैं रोता, तो माँ टोक देतीं, "मर्द ऐसे नहीं रोते बेटा।" पिता का नारा था, "शेर कभी नहीं रोता।" धीरे-धीरे मैंने सीख लिया कि दर्द को अंदर ही रखना है। एक बड़े भाई होने की ज़िम्मेदारी भी थी—बहन की समस्याएँ सुलझाओ, पर अपनी चिंताएँ कभी मत बताओ। क्योंकि अगर मैं भी टूटा हुआ दिखा, तो परिवार का आधार ही डगमगा जाएगा।
यही वह समय था जब लड़कपन की मेरी सारी भावनाएँ दब गईं। "मर्दाना बनो!" यही आवाज़ हर मोड़ पर सुनाई दी। क्लीन शेव करते समय लोगों का हँसना—शायद मूँछ ही हमारे 'मर्दानापन' का प्रतीक बन गई है, हमारी छवि बन गई है।
बाज़ार में लगी कीमत
ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ी, ज़िम्मेदारियों की परिभाषा भी बदल गई। हमें सिखाया गया: "लड़कियाँ भले ही कम सीखें, पर तुम्हें आगे जाकर उन्हें संभालना है। इसीलिए खूब पढ़ो, अच्छी नौकरी करो। जितनी अच्छी नौकरी, उतनी ही 'अच्छी' लड़की मिलेगी।"
तो एक बात तो साफ़ थी: लड़कों के ऊपर 'सफलता' और 'सेटल्ड' होने का दबाव बचपन से ही डाला जाता है। सपने? वे तो दम ही तोड़ देते हैं। हॉस्टल में जब दोस्त बर्थडे पार्टी के लिए पैसे देते थे, मैं बहाना बनाकर टाल देता था, क्योंकि कंट्रीब्यूशन के लिए पैसे नहीं होते थे। Hero-Honda या एक्टिवा का सपना, फटी जेब के सामने टूट जाता था। एक ड्रीम गर्ल की चाहत भी, 'लड़कियों के नखरे झेलने की औकात नहीं है'—इस सोच के सामने दम तोड़ देती थी।
हालात आज भी नहीं बदले हैं। आज जब तथाकथित 'दहेज' व्यवस्था को बुरा माना जाता है, तब भी विवाह बाज़ार में 'वेल-सेटल' लड़के की अपेक्षाएँ आसमान छूती हैं। "लड़का ₹१ लाख महीने का कमाए, खुद का घर हो, माँ-बाप साथ न रहें..." ये सब क्या है? यह बस एक अप्रत्यक्ष दहेज है, जहाँ आपकी कीमत आपके बैंक बैलेंस से लगाई जाती है। आपकी डिग्री, आपका स्वभाव... सब गौण है।
ज़िम्मेदारियों का अनंत भार
नौकरी पाकर मैंने सोचा था कि अब सब ठीक हो जाएगा, अपने सपनों के लिए वक्त दूँगा। पर घर के खर्चे, पुरानी ज़िम्मेदारियाँ और नई ज़रूरतों के बीच सैलरी मिलने के दो दिन में ही बैंक बैलेंस नील हो जाता था।
तब मुझे समझ आया कि पापा कैसे मैनेज करते थे, कैसे वह कम सैलरी में सर्वाइव करते थे। शायद इसीलिए जब बाबा घर आते थे, तो इतने शांत रहते थे, क्योंकि परिस्थितियों ने उनको शांत किया था।
हमारी भूमिका कितनी सीमित हो गई है: एक ड्राइवर ("गाड़ी तुम ही चलाओगे ना?"), एक मज़दूर ("ज़रा ये भारी बैग उठा देना!"), और एक कमाने वाला ATM। क्या कभी किसी ने पूछा कि 'क्या तुम्हें दर्द हो रहा है? क्या तुम थके हो?' नहीं, क्योंकि हम 'पत्थर दिल' होते हैं।
जश्न और खामोशी का फ़र्क
महिला दिवस (८ मार्च) एक विजयोत्सव है, एक क्रांति का प्रतीक है—सदियों के संघर्ष और हक़ के लिए लड़ी गई लड़ाई का जश्न। उसे संयुक्त राष्ट्र का समर्थन मिला है, दुनिया का शोर मिला है।
लेकिन पुरुष दिवस (१९ नवंबर) एक खामोश अपील है, एक 'अधूरा दरवाज़ा' है। यह उन आँसुओं की कहानी है जिन्हें बहने की इज़ाज़त नहीं है, उन हार्ट अटैक्स की बढ़ती संख्या का सच है जो हमें बचपन से सिखाए गए 'रोना नहीं' के कारण मिलती है।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है जब शादी के बाद माँ कोसती है कि 'बीवी के पल्लू में रहता है', और बीवी शिकायत करती है कि 'माँ के पल्लू में रहता है'। ऑफ़िस का टेंशन, घर में दोनों का झगड़ा... यह सब मैनेज करते-करते वह बस 'ज़िंदा' रहता है। और अगर इस सबमें वह माँ या बहन की एनिवर्सरी भूल जाए, तो सुनता है कि 'शादी के बाद बेटा/भाई बदल गया।'
बस मुझे यही कहना है: मर्द को भी कभी-कभी समझना चाहिए। आप कभी एक बार उसको समझिएगा, वह आपको आपसे दस गुना ज़्यादा समझेगा। क्योंकि उसके पास देने के लिए सिर्फ ज़िम्मेदारियाँ नहीं, बहुत सारा अनकहा प्यार भी है, जो उसने अपने अंदर दबाकर रखा है।
यह मेरा व्यक्तिगत विचार है, किसी लिंग को लक्षित नहीं कर रहा हूँ, बस अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ। शायद कोई सहमत होगा, या कोई असहमत।
हैप्पी इंटरनेशनल मेन्स डे।
@santoshhadapad
©संतोष हडपद

Sunday, 28 September 2025

International men's day

 आज सुबह सुबह संडे के दिन लेट उठने का दिन, जैसे डेली का रूटीन रहता है वैसे ही होगा ऐसे लगा था, पर जैसे मेसेज देखा तो मेरी एक फ्रेंड ने मुझे मेसेज किया था, "हैप्पी इंटरनेशनल मेन्स डे",


जैसे हर वक्त हर मर्द लोक किसी का बर्थडे, शादी की सालगिराह याद नही रख पाते, वैसे ये भी डे मुझे याद नही था,


कैसे याद रहेगा, इंसान के दिमाग में कुछ खाली रहेगा तोही इन सब बाकी चीजें याद में रखने के लिए समय मिलेगा,


जब घर में लड़का पैदा होता है तो पहले खुशी से पेढ़े बाटते थे, लेकिन उस लड़के को पता नहीं आगे जाकर उसकी जिंदगी में क्या क्या चीज़ से लड़ना है,


पता नही जब मैं पेहली बार क्लीन शेव किया था, तो सब मुझ पर हस रहे थे, शायद मर्द का मूछ से ही उसका मर्दाना साबित होता होगा ऐसे लगा मुझे, या फिर यही छभी होती होगी मर्द होनेंकी,


जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ती गई वैसे वैसे मुझे समझने लगा की लड़कियां भले ही ना सीखे उन्हें किसी को संभालना नही है, आपको आगे जाकर किसी लड़किको आपकों आगे जाकर संभालना है यही इसीलिए आपको खूब पढ़ लिखकर अच्छा नौकरी करो, और जितना अच्छा नौकरी पाओगे उतनी ही अच्छी लड़की आपको भविष्य में आप से शादी करेगी


तो एक बात तो क्लियर हुआ, बस लड़कों के ऊपर जिम्मेदारी का बोझ बचपन से ही डाला जाता है, तुम्हे आगे जाकर अपने मां बाप को संभालना है, अपनी बीवियोंकी जरुरते पूरे करने है, लेकिन ये कोई नही बताएंगे की बेटा आपके क्या सपने है?


वैसे सपने तो दम ही तोड़ देते है इतने सारे जिम्मेदारियों के वजह से, एडजस्टमेंट करना तो सब आदत से हो गई थी, हॉस्टल में जब बर्थडे पार्टी के लिए सब जाते थे, लेकिन मैं कुछ न कुछ बहाने करके टाल देता था, क्योंकि कंट्रीब्यूशन के लिए मेरे पास पैसे नहीं होते थे,


दिवाली के लिए कपड़े लेना भी इतनी जरूरत नहीं लगती थी, दोस्तो के साथ हैंगआउट करना भी छोड़ देता था, क्योंकि मैं अपना आर्थिक स्थिति को अपने दोस्तो के साथ भी शेयर नही कर पाता था,


Hero-honda या फिर एक्टिवा पे राइड करना मेरा भी सपना था, लेकिन हालाथ के सामने पैदल चलना ही एक विकल्प था,

कोई एक मेरी भी ड्रीम गर्ल हो ऐसे लगता था, लेकिन फटी जेब मुझे मेरी औकात के बाहर का सपना देखने से मना करता था, क्योंकि लड़कियोंके नखरे झेलने की मेरी औकात नही थी,


हालातों से लड़के मैंने एक अच्छा नौकरी पा लिया अब सोचा आगे जाकर सब ठीक हो जायेगा, समाज से नजर से अब मैं अपने पैर के ऊपर खड़ा था, अब मैं मेरी खुद की किस्मत बदलुंगा इसका उम्मीद था,


सोचा था नौकरी पाते ही मेरे खुद के सपनो के लिए वक्त दूंगा, लेकिन घर के खर्चे, जिमीदारियो के खर्चों में सैलरी मिलने के दो दिन में ही बैंक बैलेंस नील हो जाता था, 


तब मुझे समझ में आया की कैसे बाबा सभ चीज़ कैसे मैनेज करते थे,

जरूरत और इतने से सैलरी में सरवाइव कैसे करते थे, शायद इसीलिए जब बाबा घर आते थे तो इतने शांत रहते थे, क्योंकि परिस्थितियों ने उनको शांत किया था।


आप लोगो को पता होगा औरतों से ज्यादा आदमियों को ज्यादा हर्ट अटैक ज्यादा होते है, क्योंकि लड़के कभी नही रोते ये बचपन से ही सीखाते है,


जब मैं अपने दोस्तो के बारे में सुनता हूं, उनकी शादियां नही हो रहे , रीजन कंडीशन,

१ लड़का पढ़ा लिखा हो,

२.खेत होना चाहिए (but लड़कियां खेत में काम नहीं करेगी)

३.१लाख महीने का तनखा हो

४.अकेला हो(भाई बहन नही हो)

५.उसे खाना पकाना आता हो

६.metro City me रहता हो और खुद का घर हो,

लड़की के बापको भी खुद का घर बनवाने में जिंदगी चली गई ये नही सोचेंगे, 

७.अपने मां बाप के साथ नही रहना चाहिए।

८. Dowary(देहेज/हुंडा) नही लेना चाहिए,


बट इनडायरेक्टली यें सब दहेज ही है ना,


सबसे ज्यादा तो आदमीयोंकी तकलीफ तब बड़ जाती है , जब वो शादी करके अपने फैमिली के साथ रहता है,

मां कोसती है की बीवी के पल्लू में रहता है, और बीवी कहती है मां के पल्लू में रहता है, ऑफिस का टेंशन , घर में मां और बीवी कि झगड़े ये सब चीजें मैनेज कर कर के जिंदा रहते ही है, तभी बहन का या फिर मां का एनिवरसरी भूल जाए तो, उस पर भी सुनना पढ़ेगा को शादी के बाद भाई /बेटा बदल गया, सिर्फ बीवी के ही याद रहता है etc etc...


बस मुझे कहना है की मर्द को भी कभी कभी समझना चाहिए,

आप कभी एक बार उसको समझिएगा वो आपको आपसे दस गुना ज्यादा आपको समझेगा,


By the way,


This is my personal opinion, not targeting to any gender just exprssing my thoughts,

May be someone will aggree or someone will not.


हैप्पी इंटरनेशनल मेन्स डे।


@santoshhadapad


©संतोष हडपद

मतलब

बिना किसी फायदा के, कोई पास नहीं आता,  
रिश्तों की गलियों में भी, कदम अक्सर पीछे हट जाते हैं।  
हमारी हँसी, हमारी खुशियाँ,  
कभी-कभी सिर्फ दूसरों के फायदे के लिए नापी जाती हैं।  

और हम भी… हाँ, हम भी  
कभी-कभी खुद को मतलब का बना लेते हैं,  
कभी-कभी अपनी सुरक्षा और स्वार्थ के लिए  
दूरी और चुप्पी अपना लेते हैं।  

पर यही तो जिंदगी है…  
रिश्ते बिकते हैं, रिश्ते टिकते हैं,  
उनकी गहराई, उनकी सच्चाई पर।  
जो बिना उम्मीद और बिना हिसाब के साथ रहते हैं,  
वो ही असली रिश्तों की पहचान हैं।  

वो अपनापन, वो मोहब्बत,  
जो हर दर्द को सहला सके,  
जो बिना कहे समझ जाए,  
वो ही हमारे जीवन का असली रत्न है।  

बाकी सब, सिर्फ दिखावा और मतलब का खेल है,  
जो चाहे दूर हो जाए, चाहे पास हो जाए,  
पर जो सच्चा है, वही यादों में हमेशा जिंदा रहता है।  

इसलिए सीख लो,  
रिश्तों की भीड़ में खुद को मत खो देना,  
और सच्चाई की तलाश में,  
दिल से जीना मत भूलना।

Sunday, 3 August 2025

खरच, मैत्री नाही राहिलं – अनुभवातून उमजलेलं सत्य

भाग 1: खरं मैत्री नाही राहिलं

 

"मैत्रीचा खरा अर्थ समजण्याआधी ती अनुभवली होतीत्या निरागस दिवसांत."



आजची मैत्री म्हणजे केवळ सोशल मीडिया पर्यंत मर्यादित राहिलीय. पूर्वीच्या काळी एखादा मित्र आजारी असेल, तर रात्रभर जागून त्याची सेवा करणारे मित्र असायचे. आज मात्र स्टेटस बघून, "Get Well Soon" चं टेक्स्ट टाकणारे हजारो असतात, पण खरी काळजी करणारा एकही नसतो.

एक प्रसंग आठवतो. मला एकदा डेंग्यू झाला होता. ताप खूप जास्त होता, अंगात त्राण नव्हतं, आणि हॉस्पिटलमध्ये अॅडमिट होण्याची वेळ आली. त्या क्षणी मी अक्षरशः कोलमडून गेलो होतो. आई-वडील गावी होते, आणि मी पुण्यात एकटाच राहत होतो. हॉस्पिटलमध्ये दाखल केलं गेलं. सलाईन चालू होतं, तोंडाला मास्क होता, आणि पूर्ण अंग भरून गेलेलं.

माझ्या मोबाईलमध्ये 500 कॉन्टॅक्ट्स होते. पण त्या दिवशी एक फोन सुद्धा आला नाही. मी स्वतः मोबाईल उघडून काही मित्रांना मेसेज केला. "भाऊ, हॉस्पिटलमध्ये आहे रे, डेंग्यू झालाय." प्रत्येकीकडून एकच उत्तर – "अरे बापरे! लवकर बरं हो रे! Take care!"

त्यानंतर दुसऱ्या दिवशी दुपारी एक मित्र – सचिन – थेट हॉस्पिटलमध्ये आला. हातात मोसंबीचा रस आणि पाणी. म्हणाला, "तू काही बोलू नको, मी इथे आहे. डॉक्टरांना बोलून घेतो, आणि तू फक्त विश्रांती घे." त्या क्षणी डोळ्यांतून पाणी आलं. कारण तो एकटाच होता जो प्रत्यक्ष भेटायला आला. बाकी सर्व लोकांनी केवळ इंस्टाग्रामवर "Get well soon bro" लिहिलं होतं.

त्या दिवशी मी जाणवलं – डिजिटल जगात नाती खूप superficial झाली आहेत. जेव्हा गरज असते, तेव्हा status update पुरेसं मानलं जातं. पण खऱ्या मित्राला, खऱ्या मैत्रिणीला, आपल्या अस्तित्वाची – आपुलकीची जाणीव असते.

माझं बरं झाल्यावर मी काही मित्रांना फोन करून विचारलं, "तू नाही आलास?" तर उत्तर होतं, "अरे workload होतं, घरी पाहुणे आले होते." पण तेच लोक माझ्या बर्थडेच्या दिवशी Insta Story टाकायला विसरत नाहीत.

मैत्री म्हणजे चार स्टोरीज, पाच कमेंट्स, आणि ग्रुप फोटो नाही. मैत्री म्हणजे त्या काळजाची ओल, जी अंधाऱ्या रात्रीत सुद्धा आपल्यासाठी येते. सचिनचं हे उदाहरण आजही माझ्या हृदयात जिवंत आहे.

आज जेव्हा मी एखाद्या मित्रासाठी काही करतो, तेव्हा त्यात सेल्फी नाही, status नाही – पण एक खरं मन असतं. कारण अनुभव शिकवतो की, "खरं मैत्री नाय राहिलं... पण कुठेतरी अजूनही एखादा सचिन सापडतो."


बालपणातली मैत्री म्हणजे निर्मळ, निष्पाप, आणि मागता मिळालेलं नातं.
तेव्हा कोण किती श्रीमंत आहे, कोण हुशार आहे, कोण सुंदर आहेयाचा विचारच नसायचा.
फक्त खेळायला कुणी आहे का? एवढाच प्रश्न असायचा.

माझ्या गल्लीतला तो मित्रसागर.
दररोज दुपारी लहानशी प्लॅस्टिकची बॅट घेऊन माझ्या दाराशी यायचा.
"ये चल क्रिकेट खेळू" – एवढं म्हणायचा, आणि मग आमचं जग सुरू व्हायचं.

भांडणंही असायचीएका चॉकलेटवरून तासभर बोलणं,
पण त्याच संध्याकाळी पुन्हा एकत्र खेळायला लागायचं.
कुणी ‘ego’ नावाचा शब्द शिकवला नव्हता.

शाळेच्या सायकल रॅकवर आम्ही एकमेकांसाठी जागा ठेवायचो,
पेन हरवलं की आपलं द्यायचं, डब्ब्यातून शेवटीचा पराठा शेअर करायचो.
त्या काळात कुणीस्वार्थशिकवलाच नव्हता.

पण आज?
त्या मित्राला शेवटचं कधी भेटलो तेही आठवत नाही.
ज्याच्यासोबत बालपण घालवलंतो आयुष्यातून कधी निघून गेला, समजलं नाही.

कधी वाटतं
त्या बालमैत्रीत काहीच मागता मिळालं होतं
आणि आजच्या मैत्रीत, सर्व काही दिलं तरी आपलं काहीच राहत नाही.

 

 

 

 

भाग 2: उपयोगासाठी मैत्री



एक गोष्ट लहानपणापासून ऐकत आलो होतो – "मित्र म्हणजे संकटात साथ देणारा." पण हळूहळू कळू लागलं, आजकाल मित्र म्हणजे – "ज्याची गरज असेल तेव्हाच आठवण येणारा."

एका वेळची गोष्ट. माझा एक वर्गमित्रअमेयअनेक वर्षांनी अचानक फोनवरून संपर्कात आला. "भाऊ, एक काम होतं रे... एक फॉर्म भरायचा आहे, तुझा आधार कार्ड आणि सिग्नेचर लागेल." मी काही विचारता लगेच होकार दिला. कारण कॉलेजमध्ये तो खूप जवळचा होता. त्याच्यासोबतचे अनेक क्षण आजही लक्षात होते.

मी ऑफिसमध्ये बिझी होतो तरीही वेळ काढून त्याला मदत केली. त्याला पाहून मनात उत्सुकता होती की आता जुना मित्र भेटतोय, त्याच्यासोबत बसून गप्पा होतील. पण त्यानं फॉर्म घेतला, सिग्नेचर घेतलं आणि निघून गेला. फक्त 5 मिनिटं थांबला असेल. मी म्हटलं, "थोडावेळ बस ना... कॉलेजची आठवण झाली बघ."

त्याचं उत्तर होतं – "भाऊ, पुढे अजून एक काम आहे, नंतर बोलूया." आणि तो गेला.

पुन्हा तीन महिने झाले, कोणताही फोन नाही, मेसेज नाही. आणि एक दिवस पुन्हा फोन आला – "भाऊ, एक reference पाहिजे job साठी, तुझ्या कंपनीत कुणाला सांगशील का?"

त्या क्षणी मनात एक कडवट भावना आलीमी काय त्याचा फॉर्म भरायचा agent आहे का? फक्त काम असेल तेव्हाच आठवण?

अनेक नात्यांमध्ये आज हीच पोकळी निर्माण झाली आहे. आपण कोणाच्या contact list मध्ये असतो, पण मनात नसतो.

माझा एक नियम आहे आताजेव्हा कुणी मला फक्त गरजेपुरतं आठवतं, तेव्हा मी त्यांच्या आठवणीपेक्षा स्वतःचं मन जपतो.

मैत्री म्हणजे उपयोग नाही, ती ओळख असावी लागते. जर फक्त कामापुरती मैत्री असेल, तर ते नातं नसून व्यवहार आहे.

आणि आयुष्य व्यवहाराने नव्हे, आपुलकीने चालतं.



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाग : सोज्वळपणाचं हास्य करतात

 

("कधी काळी लोक सच्चेपणासाठी जीव द्यायचे... आता त्यावर मीम्स बनतात.")

शाळेच्या काळातली गोष्ट. आपल्या वर्गात एक मुलगा होताचिन्मय. हळूवार बोलणारा, नम्र आणि प्रामाणिक. कुणावर कधी चिडला नाही. मुलींशी बोलताना नजरेत आदर, आणि मुलांशीही तोच नम्रपणा. अभ्यासात मध्यम, पण वागण्यात भारी.

एकदा एका मित्राचं पेन हरवलं. वर्गात कोणतंही सबळ पुरावं नसताना, फक्त "तो शांत असतो ना, म्हणून तोच घेतलं असेल" असं म्हणून लोकांनी त्याच्यावर संशय घेतला. तेव्हा मी त्याच्यासमोर बसलो होतो, आणि मला माहीत होतं की त्यानं पेन घेतलं नव्हतं. पण मीही गप्प राहिलोकारण जास्त बोललो असतो, तर " भावाचा वकील का होतोय?" असं म्हणत लोक माझंही हसू केलं असतं.

त्यावेळी लक्षात आलंसोज्वळपणं म्हणजे समाजासाठी अपराध झालाय असं समजलं जातं. आणि "थोडं चळवळं, थोडं दिखाऊ" नसाल तर तुम्ही हसवणं किंवा दुर्लक्षित होण्याचं साधन होता.


कॉलेजमध्ये अशीच एक श्रुती नावाची मैत्रीण होती. फारसा मेकअप नाही, फोनवर अजिबात लटकणारी, सोशल मीडियावर फारशी अ‍ॅक्टिव्ह नाहीपण एका दमदार मनाचं व्यक्तिमत्त्व असलेली मुलगी. विचार स्पष्ट, बोलताना दुसऱ्याच्या भावना लक्षात घेणारी. तिच्या वर्गातले काहीजण तिला "पुराणिक बाई" म्हणून चिडवत.

एकदा मी विचारलं, "तुला वाईट वाटत नाही का याचं?"
ती फक्त हसून म्हणाली, "सत्य बोलायची सवय आणि शुद्ध राहण्याचा हट्ट असेल तर टोमणे सहन करावे लागतात."

म्हणजे आयुष्यात तुमचं वागणं जर समाजाच्या 'कॉमन कोड' मधून वेगळं असेलम्हणजेच तुम्ही दांभिक नाही, उगाच उथळ नाही, आणि दिखाऊपणाला थारा नाहीतर लोक तुम्हाला उघडपणे नाही तर विनोदातून बाजूला काढतात.

कधी तुमचं प्रामाणिक बोलणं “too much honesty” म्हणून हिणवलं जातं.
कधी कुणाचं साधं राहणं म्हणजे "Personality नाही रे याला" असं म्हणत त्याच्या मागे हसतात.
कोणीतरी चहा समोर ठेवल्यावर "Thanks" म्हणतो, तर दुसरं म्हणतं, "अरे, याला अजून संस्कार जिवंत आहेत!" – उपहासाने.

हीच माणसं नंतर पोस्ट करतात, "Good vibes only", "Be real", "Loyalty is rare these days". पण प्रत्यक्ष आयुष्यात कुणी ‘real’ भेटला की तो त्यांच्या मिम्सचं आणि जोक्सचं कारण बनतो.

खरं म्हणजे सोज्वळ माणसं ही समाजाच्या आरशातली खर्‍या चेहर्‍याची प्रतिबिंबं असतातपण आपण त्या आरशालाच फोडायला लागलोय.

आजकाल जर तुम्ही कोणावर विश्वास दाखवला, कुणाला दिलं तर खरं प्रेम दिलं, कोणाला निःस्वार्थपणे मदत केलीतर लोक म्हणतात, "इतका भोळा कसा काय हा?"

काय बदललंय आपल्या सभोवताली?
चांगुलपणं हास्याचं कारण का बनलंय?
कुणी प्रामाणिक असलं की ते ‘smart’ नसतं का?
सोज्वळपणं आता एखादं जुनी गोष्ट झालंय का?

 

एकदा एका मित्राच्या डोळ्यात अश्रू आलेखरं वाटेल अशी गोष्ट. एका मित्राच्या अपघातात त्यानं त्याचा हात गमावला होता. तो सांगताना त्याचे डोळे पाणावले. दुसरे काहीजण म्हणाले, "हाहा... रोमान्टिक फिल्म बघून आलास वाटतं!"
त्या हसण्यामागे एक प्रकारचा असंवेदनशीलपणा होताजो आजच्या काळात cool समजला जातो.

आजकाल भावना दाखवणं म्हणजे अशक्तपणा वाटतो. आणि म्हणून लोक नकळत सोज्वळपणावर हसतातकारण ते त्यांना असुरक्षित वाटायला लावतं.
आपल्या नकळत आपल्यालाच टोचणाऱ्या गोष्टींवर हसणं सोपं वाटत


सोज्वळपणाचं हास्य करतातकारण त्यांचं स्वतःचं अंतरंग कधीकाळी सोज्वळ होतंपण आता गोंधळलेलं आहे. आणि म्हणून सच्चेपण पाहिलं की ते अस्वस्थ होतात. त्या अस्वस्थतेतून मग उपहास निर्माण होतो.
पण सच्चेपणा हा क्षणिक हसण्याने हरवत नाही.
तो लपतो. शांत होतो.
आणि एका क्षणीआपल्या मनाला शांत करण्यासाठीआपण पुन्हा सोज्वळ माणसांची आठवण काढतो.
त्यावेळी लक्षात येतं
"ज्याच्यावर एकेकाळी हसलो होतो, तोच आज आपल्या आयुष्यातला सर्वात खरी व्यक्ती होता."


 

 

 

 

 

 

भाग : एकतर्फी मैत्रीचं ओझं

 

"कधी नातं समोरच्याच डोक्यावर ठेवलं जातंआणि तेच डोक्याला मारून जातं."

"मित्र" हे शब्द ऐकताना बहुतेक वेळा मनात दोन चेहेरे येतात
एक आपण त्यांच्यासाठी काय काय केलं, हे आठवणारा
आणि दुसरा, जो कधीच आपल्यासाठी काहीच करत नव्हता, पण तरीही आपण त्याला 'मित्र' मानत होतो.

हेच आहे एकतर्फी मैत्रीचं ओझं.

कधी आपण कोणासाठी वेळ देतो, मदत करतो, त्याचे वाढदिवस लक्षात ठेवतो, त्याला अडचणीतून बाहेर काढतोआणि जेव्हा आपल्यावर वेळ येते, तेव्हा तेच लोक "सॉरी यार, मी बिझी होतो" म्हणतात.

हे "बिझी" खूप बोलकं असतंकारण आपली किंमत त्यांच्यासाठी तिथेच संपलेली असते.


माझ्या आयुष्यात एक प्रणव  नावाचा मित्र होता.
त्याचं नातं माझ्यासाठी मोठं होतंशाळेपासून कॉलेजपर्यंत मी त्याच्याबरोबर होतो. अभ्यास असो, कोणती समस्या असो, मी नेहमी पुढे असायचो. त्याचं breakup झालं, त्याला समोर उभं राहायला त्रास झाला, घरचं प्रेशर वाढलंया सगळ्या टप्प्यांवर मी त्याच्यासोबत होतो.

एकदा माझ्यावर एक मोठी अडचण आली.
घरात आर्थिक संकट, मनावर ताण, आणि कामातही गडबड.
मी त्याला फक्त एक फोन केला...
त्याचा पहिला शब्द होता"यार, मी खूप अडकलेलो आहे. नंतर बोलतो..."
तो 'नंतर' अजूनपर्यंत आलेलाच नाही.

तेव्हा पहिल्यांदा लक्षात आलं"आपण ज्यांच्यासाठी पूर्ण वेळ तयार होतो, त्यांच्यासाठी आपण एक पर्याय असतोगरज संपली की विसरले जाणारा."

एकतर्फी प्रेम दुखतं, हे सगळ्यांना माहीत आहे. पण एकतर्फी मैत्री?
ती दिवसेंदिवस खोलवर जखमा करते, कारण प्रेमात अपेक्षा स्वाभाविक वाटतात, पण मैत्रीत नको असताततरी असतात.

कधी कधी आपण मैत्री टिकवण्यासाठी स्वतःचं "स्व" हरवतो. त्यांच्या पसंतीनुसार वागतो, त्यांना खुश ठेवण्यासाठी आपल्या भावना गिळून टाकतो.
ते 'busy' असतील तरी आपण त्यांना समजून घेतो,
पण आपल्याला थोडं दुर्लक्ष झालं की ते लगेच नाराज होतात.

हे नातं, जे आपल्यासाठी खूप खास असतं,
समोरच्याच्या डोक्यात क्वचितच फिरकतं.

एकतर्फी मैत्री म्हणजे "तुम्ही ओलांडलेले हजारो पायऱ्याआणि समोरचा अजून पाय ठेवायला तयार नाही."
तेव्हा मनात विचार येतो:
आपण एवढं का केलं?
का रोज त्यांच्या सुखदु:खाच्या गोष्टी ऐकल्या?
का आपल्या स्वप्नांच्या वेळा त्यांच्यासाठी दिल्या?

उत्तर मिळत नाही
फक्त "मी खरंच मित्र होतो, तेवढंच खरं."

एक मित्र होता, जो नेहमी म्हणायचा, "तू माझ्यासारखाच आहेस."
पण नंतर लक्षात आलंमी त्याच्या सारखाच होण्याचा प्रयत्न करत राहिलोआणि तो कधीच माझ्यासारखा होण्याचा प्रयत्न केला नाही.

या नात्याचं सर्वात मोठं ओझं म्हणजे
"तुमचं अस्तित्व फक्त गरजेच्या वेळेस आठवलं जातं."

त्यांच्या नव्या मित्रमंडळींसोबत फोटो, ट्रिप्स, पार्टीतिथे आपली जागा नसेल.
पण त्यांना कुणाशी भांडण झालं, तणाव आला, एकांत वाटलाकी पुन्हा आपण.

या परिस्थितीने आपण बदलायला शिकतो
"थांबण्याचं महत्त्व" कळतं.
माणसांसाठी एवढं 'उपलब्ध' राहणं हा गुन्हा असतो कधी कधी.
कारण काही लोक सवयीने घेतात, कदरनं नाही.

एकतर्फी मैत्रीतून बाहेर पडणं कठीण असतं
पण गरजेचं असतं.

कारण सच्च्या नात्यांमध्ये दोघंही चालतात
तिथे फक्त एकजण धावत राहिला, तर तो शेवटी दमतोच.

तू जर वाचक म्हणून ही भावना अनुभवली असेल,
तर कदाचित तुला एखादा प्रणव आठवेल
किंवा कदाचित तूच कोणाचातरी एकतर्फी प्रणव असशील

पण काहीही असोएकतर्फी नात्यांना संपवणं मतलबीपणाचं नाही,
तर स्वतःचं रक्षण आहे.


 

भाग : लोक बदलतातकारण गरजा बदलतात!

 

 

कधी वाटतं का, की एक काळ होता जेव्हा आपण कोणाच्या आयुष्यात खूप महत्त्वाचे होतोपण आज त्यांना आपण आठवतोसुद्धा का, हीच शंका वाटते?

हे फक्त तुझ्याच आयुष्यात घडत नाही.
ही आपल्या काळातील सगळ्यात उदास आणि वास्तववादी गोष्ट आहेलोक बदलतात.

कधी आपण त्यांच्या अंधारात दिवा होतो,
पण आज त्यांचं आयुष्य उजळलं की ते आपल्यालाच विसरतात.
कधी आपलं "कसं आहेस?" त्यांच्यासाठी एक हक्काचा प्रश्न होता,
आणि आज तेच "seen" वर थांबलेलं असतं.

 

माझ्या आयुष्यात अदिती नावाची एक मैत्रीण होती. कॉलेजच्या दुसऱ्या वर्षी ओळख झाली. संध्याकाळचे चहा, प्रोजेक्टवर चर्चा, तिचे डोळ्यातले स्वप्नंमी ते ऐकत राहायचो. तिच्या एका breakup नंतर मी तिच्यासोबत तीन महिने रोज वेळ घालवला, फक्त ती पुन्हा हसावी म्हणून.

मग ती एका मोठ्या कंपनीत जॉब लागल्यावर दुसऱ्या शहरात गेली.
सुरुवातीला रोज कॉल, रोज अपडेट्स
हळूहळू आठवड्यातून एकदामग फक्त तिच्या स्टोरीजवर reply…
आणि आता"She’ll reply when she remembers."

का असं होतं?
कारण तिची गरज मी तेव्हा होतोआता नाही.

 

हे खूप वेदनादायक असतं
तू अजूनही त्यांच्यासाठी तिथेच असतोस,
पण त्यांना आता तुझी गरजच उरलेली नसते.

आपण त्या नात्याला अजूनही तितकंच जपतो,
जसं पहिल्या दिवशी केलं होतं
पण त्यांचं मन पुढे निघून गेलेलं असतं.
कधी कधी तर ते तुला विसरले नाहीत,
ते तुला विसरणं निवडलेलं असतं
कारण "आता काही काम नाही, ना?"

 

माणसं बदलतातआणि खरे सांगायचं तर ते त्यांचा हक्क आहे.
पण बदलताना जी गोष्ट सर्वात जास्त ठसते, ती म्हणजे
ज्यांच्यासाठी आपण सारं काही दिलं, त्यांनीच आपल्याला काहीच समजता मागे टाकणं.

तेव्हा प्रश्न मनात उठतो
"मी खरंच गरज होतो की पर्याय?"
"त्या काळातली आपली मैत्री खरी होती, की गरजेचा तो काळ फक्त आपल्यासाठी खास होता?"

या प्रश्नांची उत्तरं वेळच देतो
पण तोपर्यंत आपण फक्त थांबून, स्वतःला सावरतो.


लोक बदलतातआणि त्या बदलांना सामोरा जाताना मन कठीण होतं.
जे जुने वाटायचं, ते आता ओळखीचंही वाटत नाही.
कधीकाळी जिनं वर जाताना वाट बघणारा मित्र,
आज त्याच जिन्यावरून जातो, पण आपल्याला पाहूनही नजरेत ओळख नसते.

तेव्हा लक्षात येतं"माणसं गरजेनुसार प्रेम करतात, सवयीप्रमाणे आठवतात, आणि वेळ आल्यावर विसरतात."

आणि म्हणून
"तू ज्या लोकांना 'सावली' बनून साथ दिलीस,
ते उन्हात गेल्यावर तुला विसरतात."

पण यातून शिकण्यासारखं खूप आहे.
माणसं जातात, आठवणी राहतात.
आपण बदलू शकत नाही दुसऱ्यांचं वागणं,
पण आपली स्वतःची कदर करणं शिकू शकतो.

हे भाग्य आहे की तू कोणासाठी तरी उपयोगी होतास.
पण शाप ठरतो तेव्हा,
जेव्हा तू स्वतःसाठी उपेक्षित होतोस.

म्हणून पुढे जा
कोणी साथ दिली, तर ठीकनाही दिली, तरीही तुझा मार्ग थांबू नये.
कारण आपल्या माणसांचा बदल आपल्याला तोडू नयेघडवावं पाहिजे.

 

 

भाग : जेवताना वाटतंआता आपलं कोणी नाही!

"पानात अन्न आहे, पण मनात शांतता नाहीकारण समोर बसणारे चेहरे हरवलेत."

 

कधी एखादा रविवार असतो
घरात गरम भाजीचा वास दरवळत असतो
ताटात पोळी, भात, वरण, भाजी सगळं असतं
पण जेवताना मनात एक विचित्र पोकळी उमटते
"
याआधी हे अन्न इतकं गोड वाटायचं, आता नाही!"

का? कारण आधी समोर गप्पा असायच्या,
आज समोर फक्त मोबाईल आहेकिंवा रिकामं खुर्ची.

माणूस जेवताना पोट भरतो, पण त्याहीपेक्षा मन भरायला कोणीतरी हवं असतं
जे 'कशाला बटाटा एवढा उकडला?',
'
ही भाजी आईने छान केलीये',
'
शेवटी गोड काय आहे?' — असं सहज बोलणारे लोक.

आज हे प्रश्नही गप्प झालेत
आणि आपल्यालाही बोलावंसं वाटत नाही,
कारण "कोण ऐकतोय?"


गावात गेलं की आधी मोठं पान घातलं जायचं,
आज कोण बसलंय त्यावर?

एकेक करून नातेवाईकांनी फाटा घेतला,
मित्र वेगवेगळ्या शहरांमध्ये विस्कटले,
कुटुंबातही आता प्रत्येकाच्या हातात स्क्रीन आणि कानात हेडफोन.

माझ्या लहानपणी एक सवय होती
सगळे एकत्र जेवत, आणि शेवटी एखादा गोडाचा घास "तुझ्यासाठीच ठेवलाय" म्हणत कोणीतरी पुढं करायचं.

आज?
अन्न वाढलं जातं, पण अशा आठवणी मागं टाकल्या गेल्या आहेत.


जेवताना आजही आईचं ताट दुसऱ्यापेक्षा कमी दिसतं
ती शेवटची जेवते.
बाबा टीव्हीवर काही बघत जेवतात
भावंडं आपापल्या खोलीत
आणि आपण?

आपण बसतो, ताट बघतो, आणि अचानक लक्षात येतं
"
हे ताट खूप वेळा भरलं जातंपण हे घर आता रिकामं वाटतं."

एखाद्या लग्नात जातो,
सगळी मंडळी वाढप्याच्या मागे, फोटोसाठी गर्दी
पण जेवताना कोण शेजारी बसावं याचाही विचार आज होत नाही.

पूर्वी मित्राची वाट पाहत होतो
आता कोणाचं तरी दिसणं मनाला बोचतं.


एकेकाळी एकत्र जेवताना काही ठरलेलं नसायचं
कधी शेवटचा वड्यासाठी भांडण,
कधी वाटीतून भाजी चोरून घेणं,
कधी एखाद्याचं ताट विसळून स्वतःचं वाढणं.

आज घर मोठं झालंय, टेबल वाढलंय, प्लेट्स shining आहेत
पण त्या गप्पा, ती चव, ती उबकुठे गेलीय?

कधी वाटतं
"
हेच अन्न जर त्या जुन्या मित्रांबरोबर खाल्लं असतं, तर गोड लागलं असतं."


मनात खोल कुठेतरी ही भावना रुजते
"
आपलं कोणी नाही आता जेवताना सोबत बसणारं."

मित्रांना मेसेज करावासा वाटतो,
पण ते busy…
कुटुंबात सांगावंसं वाटतं,
पण ते already tired आहेत.

आपण आपलं ताट वाढून घेतो
आणि पहिल्या घासातच भावना अडकतात.

भूक आहे, अन्न आहे,
पण समाधान नाही.

कधी जेवणाच्या वेळेस मन थांबतं
त्या जुन्या फोटोवर
जिथे सगळे एकत्र, डोळ्यात हसू, आणि घासाच्या मागे लपलेली आपुलकी होती.


जेवण एकटे खाणं तितकं दुख: नाही,
जितकं दुख: आहेएकेकाळी ज्यांच्यासोबत जेवलो,
ते आज आयुष्यातून निघून गेले आहेत.

कधी मैत्री संपली, कधी माणसं बदलली,
कधी आपलंच मन थकून गेलं

पण या सगळ्यात एक प्रश्न पुन्हा पुन्हा उमटतो
"
कधी तरी परत सगळे एकत्र बसतील का जेवायला?"

शक्यता कमी आहे, पण आठवणी मात्र रोज सोबत खाता
पान रिकामं होतं,
पण मनात एक कोपरा भरलेला असतो
त्या जुन्या, आपुलकीच्या घासांनी.



 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाग : स्वतःसाठी वेळ देणारी मैत्री, नको!

सतत दुसऱ्यांच्या वेळेचा आदर करणारी मैत्रीपण स्वतःचा वेळ हरवणारी नाती आता झटकून टाकायची वेळ आली आहे.

 

आपण खूप वेळा "त्याला नको वाटायला नको",
"
तिला वाईट वाटू नये",
"
आपणच तर आहोत त्याच्यासाठी" —
या विचारांत स्वतःचा वेळ, मनःशांती आणि हक्काची एकांतता गमावतो.

मैत्रीचा अर्थ अनेकांनी "नेहमी available असणं" असं घेतलाय.
आपण जरा वेळ दिला की प्रश्न येतो
"
काय झालंय तुला? आधी सगळं शेअर करायचास!"
पण जेव्हा आपल्याला कुणाचं 'शेअर' हवं असतं,
तेव्हा मात्र फक्त read आणि seen.

कधी जाणवलंय का?
तुम्ही सतत त्यांच्या वेळेस आदर दाखवत असता,
पण ते कधीच तुमच्या वेळेची पर्वा करत नाहीत.


 

एक काळ होता
मी एक मित्रासाठी वेळ पाडून अनेकदा भेटलो होतो.
तो उदास असे, फोन करायचा, आणि मी सगळं टाकून त्याच्यासाठी धावायचो.

माझा अभ्यास, माझं काम, माझं मन
सगळं बाजूला ठेऊन मी फक्त त्याच्या दुःखांमध्ये सामील व्हायचो.

एकदा मीच थोडा गोंधळलेलो होतो.
फोन केला.
त्याचं उत्तर – "यार, आत्ता नाही जमणार, खूप hectic आहे."
तो दिवस आजवर लक्षात राहिलाय
कारण त्या दिवशी समजलं की मी एकटाच समजून घेत होतो.


मैत्री म्हणजे सामंजस्य.
पण जर ते एकतर्फी असेल, तर त्याचं नाव समर्पण नसून स्वतःचा अपमान असतो.

कधी आपण कुणासाठी वेळ द्यायला तयार असतो,
पण तोच मित्र/मैत्रीण सतत आपल्या उपस्थितीतही non-present असतो.
मनाने दूर असतो.
तुम्ही बोलत असता, तो फोन बघतो.
तुम्ही विचार करता, तो "हंहो ना!" म्हणत स्क्रोल करत राहतो.

कधी नात्यांमध्ये "फिजिकल उपस्थिती" असते,
पण भावनिक अनुपस्थिती असते.


आपल्याला शिकायला हवं
प्रेम करणं हे स्वतःला विसरून करण्यासारखं नसतं.
स्वतःवरही प्रेम असायला हवं.

मैत्रीमध्ये जर तुम्ही कायम दुसऱ्यांचं मन ठेवून चालत असाल,
पण समोरच्याला तुमचं मन कधीच समजत नसेल
तर तो संबंध नाहीते एक मानसिक ओझं आहे.

कधी कधी "तो busy असेल, थकलेला असेल" म्हणत आपणच त्याचा अपमान सहन करत राहतो.
पण तोच माणूस दुसऱ्यांसाठी वेळ देतो हे दिसलं की
आपल्या मूर्खपणाची लाज वाटते.


त्यानंतर मी एक गोष्ट ठरवली
"
मी त्या नात्यांतच उभा राहणार नाही, जिथे मला स्वतःसाठी वेळ उरूच नये."

आज समाज आपल्याला शिकवतं
available
असणं म्हणजे मैत्री.
पण मी शिकलो
स्वतःसाठी unavailable असणं म्हणजे मूर्खपणा.

तू स्वतःला हरवून दुसऱ्याला सांभाळलंस,
आणि नंतर त्यांनी तुला सोडून दिलं
तर "माझं हरवणं तरी काय कामाचं होतं?"
हा विचार त्रास देतो.


मैत्री सुंदर आहे
पण ती दोघांसाठी आहे,
कसोटी फक्त तुझीच असेल, तर ती मैत्री नाहीवापर आहे.

आजचा निर्णय
"
मी स्वतःच्या वेळेला महत्त्व देईन."
"
माझा वेळ, माझं मन, माझी शांततायांचं मोल समजणारेच लोक मी जवळ ठेवेन."

ज्यांना तुझी value हवी आहे,
ते तुझा वेळ मागणार नाहीततो द्यायला स्वतःहून येतील.

आणि म्हणून
स्वतःसाठी वेळ देणारी मैत्री, नको!
कारण त्या नात्यांत तुला तूच हरवतोस
आणि शेवटी कोणालाच हरवलेलं काही आठवत नाही
फक्त तू सोडून!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाग : मैत्रीतपण अबोला येतोआणि तो जास्त वेदनादायक असतो.

"अबोला म्हणजे राग नाही, अबोला म्हणजे दूर गेलोय हे सांगता कळवणं."


मैत्री म्हणजे संवाद
खळखळाट, हसणं, चिडचिड, मन मोकळं करणं.
पण मैत्रीत सगळ्यात जास्त दुःखद क्षण कोणता?
जेव्हा अचानक संवाद थांबतो.

"काय झालं?"
"का बोलत नाहीस?"
"आपण इतके जवळचे होतो ना?"
हे सगळे प्रश्न मनात कोसळतात.
पण समोरून एकही उत्तर येत नाही.

अबोला काही वेळचा असतो तर ठीक
पण कधी-कधी तो संपलेली मैत्री असतो
फक्त सांगता.


 

एक मैत्रीण होतीखूप जवळची.
आम्ही सगळं शेअर करायचो.
रोजच्या छोट्या गोष्टी, कामाचे टेंशन, घरचे किस्से
सगळं.

पण एक दिवस
तिचे मेसेज कमी झाले.
फोनसुद्धा नाही आले.
मी विचारायचो — "काय झालंय? बिझी आहेस का?"
ती फक्त "हं, थोडं बिझी आहे" एवढंच म्हणायची.
पण ते 'थोडं' दररोज वाढत गेलं.

एक दिवस लक्षात आलं
ती नाही दूर गेलीतिचं मन दूर झालंय.


अबोला हे "मूक उत्तर" असतं.
बोलता सगळं सांगून जातं.

तो संवाद नसतो, पण त्यात शब्दाहून जास्त बोच असते.

जेव्हा रोज बोलणारी व्यक्ती अचानक non-existent वाटायला लागते,
तेव्हा मनात एक रिकामी जागा तयार होते
जी कुणीही भरू शकत नाही.

कधी रागात बोललेलं एखादं वाक्य,
किंवा कुणीतरी सांगितलेली चुकीची गोष्ट,
किंवा कधी स्वतःचं अंतर ठेवणं

अबोला अनेक कारणांनी येतो,
पण "का आला?" याचं उत्तर कधीच मिळत नाही.


मैत्रीतील अबोला खास असतो
कारण तो रागातून येत नाही, तर शांततेत गोंधळ निर्माण करतो.

कधी कधी तुम्ही चुकलेही नसता,
पण कोणीतरी तुमचं अस्तित्व mute करतं.
आणि तुम्हाला काय चुकलं हेही कळत नाही.

मग तुम्ही self-doubt मध्ये जाता
"मी काही वाईट बोललो का?"
"मी ignore केलं का?"
"काय गमावलं मी?"

पण सत्य हेच की
काही सांगता गेलेली मैत्री,
तुटलेल्या दोऱ्यासारखी असते
जोडता येते, पण ती पुन्हा ती मैत्री राहत नाही.


त्यानंतर तुम्ही थांबता
प्रयत्न करायचे बंद करता
गप्प बसणं हेच योग्य उत्तर मानता.

कारण, संवाद एकतर्फी चालत नाही.
जवळ येणं जितकं सहज असतं,
तेवढंच कठीण असतं, नातं मोडताना शब्दही वापरणं.

अबोला काही वेळचा असेल तर त्यावरती बोलता येतं
पण जो "शाश्वत अबोला" बनतो,
त्याचं उत्तर मनाला फार काळपर्यंत लागतं.


मैत्रीत बोलणं महत्वाचं,
पण गप्प राहणं हेही खूप काही सांगून जातं.

तू जर कोणावर प्रेम करत असशील, त्याला जपायचं असेल
तर तुझा रागही व्यक्त कर,
पण गप्प राहू नको.

अबोल्या नात्यांमध्ये "शब्दांपेक्षा शंका" जास्त असतात.
आणि मैत्री शंकांवर नाही
विश्वासावर जगते.

म्हणून
मैत्रीतपण अबोला येतोपण जर संवाद नसेल, तर ती मैत्री नाही टिकत.

सांगकाय झालं, काय दुखलं, काय गोंधळलं
कारण एक दिवस असा येतो,
अबोला इतका वाढतो, की बोलायचं मन राहात नाहीआणि मैत्री केवळ आठवण बनून जाते.


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाग : हिशोब ठेवणारी मैत्री, नको!

"मैत्रीत जरमीच किती वेळाहे मोजावं लागत असेल, तर ती मैत्री राहात नाहीती एक व्यवहार बनते."


"मी तुला किती वेळा कॉल केला."
"मीच नेहमी भेटायला येतो."
"तुला आठवतंय का, शेवटचं तू कधी काही केलं माझ्यासाठी?"

हे सगळं ऐकलं की आतून एक टोच लागत जाते.


मैत्रीमध्ये हे सगळं बोलण्याची वेळ आली,
म्हणजे ती नातं एकतर्फी झालीय.

मैत्री ही मनातून दिलेली भावना असते,
हिशोब ठेवलेला व्यवहार नाही.

पण हल्लीचं जगआणि हल्लीची नाती
सगळं give and take वर चालतंय.
"तू केलंस, म्हणून मी केलं."
"तू विसरलास, म्हणून मी दूर झालो."

मग ती खरी मैत्री कशी राहणार?

एका मित्राने एकदा बोलून टाकलं
"तू कधी माझ्या वाढदिवशी विश केलंस का?"
मी गोंधळून गेलो.
हो, मी विसरलो होतो.
पण त्याने नुसतं विसरलेलं नाही गृहीत धरलं,
तर माझी निष्ठा तपासली.

त्या दिवशी समजलं
हिशोब ठेवल्या गेल्या की, मैत्रीचं मोल हरवतं.

कुणीतरी एकदा भेटायला वेळ काढतो,
तेव्हा समोरून "मी तर मागच्यावेळी गेलो होतो" असं उत्तर मिळतं.
हा संवाद नाहीही शंका आहे.
म्हणून मग मनातल्या गोष्टी बंद होत जातात.
नाती उथळ होतात.
आणि मैत्रीचं गारवाहिशोबात विरून जातो.


मैत्रीमध्ये हिशोब नको,
कारण खरी मैत्रीमाझं कायविचारत नाहीती फक्ततुला काय हवंय?’ असं विचारते.

तू रडतोस तर ती ऐकते,
तू चिडतोस तर समजून घेते,
तू हरवतोस तरी शोधून काढते.
ही असते निस्वार्थ भावना.

पण हल्लीचं काय झालंय ना
जर मी गिफ्ट दिलं, तर तुला पण द्यायला हवं.
जर मी स्टोरी टाकली, तर तू पण शेअर करायला हवं.
जर मी तुझ्यासाठी स्टेटस ठेवतो, तर तू पण ठेवायला हवं.

हे नातं आहे का? की सोशल मिडियाचा परफॉर्मन्स?


मैत्रीत जर अपेक्षा वाढल्या,
तर नातं नाहीसें होणं ठरलेलं असतं.


माझा एक मित्र होता, ज्याचं नेहमी म्हणणं असायचं
"मीच का विचारपूस करावी?"
"मीच का वेळ काढावा?"
"कधी तू पण करून बघ."

शेवटी मी बोलणं बंद केलं.
आणि जाणवलं
कधी-कधी माणसं हिशोब करत करत,
ते नातंच गमावून बसतात.

म्हणून मनात आलं
कोणी जर मैत्रीत मोजमाप करत असेल,
तर त्यांना मोकळं सोडावं.
कारण मैत्रीत मागणं नसावं,
त्यात देणं-घेणं नसावं
फक्त नातं असावं.


 

मैत्रीत जर एखादा दुसरा वेळ विसरलात,
एखादा कॉल उशिरा घेतलात,
एखादं भेटणं चुकवलं,
तर त्यावर हिशोब नकोसमजून घेतलं पाहिजे.

मैत्री ही "उणीव समजून घेणारी" असते,
चुकांची जबाबदारी लावणारी नाही.

कारण शेवटी,
तुम्ही एक दिवस मागे वळून बघाल,
आणि तुम्हाला लक्षात येईल


ज्यांना तुम्ही गमावलं, ते तुमच्याकडे मोजमापासाठी आले होते.
पण ज्यांनी राहिलंते तुमच्यासाठी मनाने आले होते.


"हिशोब ठेवणारी मैत्री, नको!"
हे फक्त वाक्य नाही


हा एक संदेश आहे त्या सगळ्यांना,
ज्यांनी मैत्रीला व्यवहार बनवलंय.

मैत्रीत जर तू इतकं केलंस, मी इतकं केलं
हे मोजावं लागत असेल
तर नातं जवळ येत नाहीते फक्त मायनस-प्लस होतं.

मैत्री ही नफ्याचं गणित नाही
ती मनाची उब असते.
जिथे सगळं देताना,
आपण काही गमावल्यासारखं वाटत नाही.

म्हणून


मित्र ठेवापण मोजमाप नका ठेवू.
नाती टिकतातमनाने’, हिशोबाने नाही.

 


भाग १०: जे हरवले त्यांचीच आठवण येतेकारण खरी मैत्री विसरता येत नाही

 

"कधी काळी मनात खोलवर जागा केलेली माणसं, एक दिवस दूर जातात... पण त्यांची जागा रिकामी राहत नाही. ती आठवणीतच आयुष्यभर सोबत राहतात."

 

त्या मित्राचा नंबर अजूनही मोबाईलमध्ये आहे.
परंतु त्याला फोन करावासा वाटत नाही
की करायला धाडस होत नाही?

का?
कारण नातं तुटलंय.
पण त्याची आठवण मात्र ताजीतवानी आहे.

आपण सोडतो, विसरत नाही.
आपण पुढे जातो, पण मागेचं मनात राहतं.

खरी मैत्रीही विसरणं शिकवत नाही.
ती एकदा आत गेली की, तिथे घर करते.


एकदा एक जुना मित्र स्वप्नात भेटला.
खूप हसलो, बोललो, जुन्या गोष्टी केल्या
आणि सकाळी जाग आली,
तेव्हा लक्षात आलं
आपण त्याच्याशी खूप वर्षांपासून बोललेलो नाही.

तरीही,
ती भावना होती – "आपलंच कुणीतरी भेटलं."

खरं सांगू?


मैत्रीत कधीच final goodbye नसतो.
फक्त शांततेत हरवलेलं अस्तित्व असतं,
जे अधूनमधून आठवणीत जागं होतं.


 

एकदा चुकून एखादी जुनी chat उघडली
अचानक "तुच खरी मैत्रीण आहेस" असं लिहिलेलं दिसलं.
हसावं की रडावं कळेना

कारण ती मैत्रीण आता परकी झालीये.
पण तिचं ते वाक्य? अजूनही हृदयाला हलवतं.

हेच असतं ना
खरी मैत्री संपलेली असली,
तरी तिचा असर मनावर टिकलेला असतो.

पुढे कितीही नवीन मित्र आले,
काही तरी रिकामं राहिलं
जसं काही कोणी एक होतं,
जे परत येणं शक्य नाही.


कधीकधी गाणं लागतं,
ज्यात ती खास आठवण दडलेली असते.
एखादा जुना फोटा दिसतो,
ज्यात ते गोड हास्य दिसतं
जे हल्ली फारसं कुणात दिसत नाही.

आणि मग मन विचारतं
"कसं झालं असतं, जर आपण आजही एकत्र असतो?"

ही खंत नाही
ही फक्त त्या नात्याची आठवण आहे,
जी खरंच खास होती.

कारण खरी मैत्री विसरता येत नाही
ती फक्त दूर जाते.


 

 

 

 

कधीकधी आपणच मूकपणे स्वीकारतो
"हो, तुटलं."
"
हो, परत काही होणार नाही."
"
पणआठवतं अजूनही."

कधी माफी मागायची संधी चुकते,
कधी गोड बोलायचं वेळ निघून जातो.
कधी नातं वाचवायला उशीर होतो

पण ती खरी मैत्री
तशीच आठवणीत वाचवून ठेवलेली असते.

आणि त्या आठवणी
ज्या उगाच वाट पाहायला लावत नाहीत,
पण आयुष्यभर तळ्यात खोल राहतात.

"जे हरवले त्यांचीच आठवण येते
कारण खरी मैत्री विसरता येत नाही."

हा शेवट नाही
ही एक स्वीकारोक्ती आहे.
त्या सगळ्या माणसांसाठी
ज्यांनी आपल्याला सोडून दिलं,
पण मनात घर करून गेले.

माणसं बदलतात, काळ निघून जातो,
पण काही नाती
त्या काळाच्या पलिकडे जाऊनही आठवतात.

आपण आता कोणाशीच बोलत नसतो
पण आपलं मन त्यांच्याशी अजूनही जोडलेलं असतं.

म्हणून शेवटी हेच म्हणावसं वाटतं
खरी मैत्री संपत नाही,
ती फक्त वेगळ्या स्वरूपात आठवणीत जगत राहते
शांत, खोल आणि कायमची.


 

 

समारोप

खरं मैत्री नाय राहिलंपण त्याची ओळख अजून शिल्लक आहे

 

"मन जपून ठेवतं... जे नातं संपलं, त्याची आठवण नाही.
तर जे नातं खरं होतं, त्याची ओळख."

 

या पुस्तकाच्या प्रत्येक भागात
तुटलेल्या, विसरलेल्या, बदललेल्या
आणि हरवलेल्या मैत्रीचं एक चित्र उलगडत गेलं.

एक काळ होता
जेव्हा 'मैत्री' या शब्दाचा अर्थ होता,
"शब्द वापरता समजणं."

आता?
आजची मैत्री म्हणजे
"परिस्थितीनुसार अस्तित्व असलेलं,
हिशोबी, गरजेपुरतं, आणि विसरण्याजोगं नातं."

पण या पुस्तकाच्या प्रत्येक कथेनं एक गोष्ट दाखवून दिली
"खरी मैत्री अजूनही कुठेतरी शिल्लक आहे
पण ती आपल्याला आता ओळखता येत नाही."

या गोष्टींमध्ये वेदना आहेत,
पण त्या आपण सगळे अनुभवलेल्या आहेत.

या पुस्तकात 'तू', 'मी', 'आपण'
सगळेच कुठेतरी आहोत
एकेकदा मैत्रीत गुंतलेले,
आणि आता आठवणीत हरवलेले.

म्हणूनच या पुस्तकाचं नाव
"खरं मैत्री नाय राहिलंअनुभवातून उमजलेलं सत्य"
हे नाव केवळ एक वाक्य नाही,
तर हे नात्याच्या काळजातून उमललेलं एक सत्य आहे.

मैत्री तुटली की ती पुन्हा नवी होत नाही,
ती केवळ आठवण बनते.
आणि काही आठवणी इतक्या जिवंत असतात,
की त्या विसरणं ही निष्ठुरपणा वाटतो.

माझं हे लेखन हे केवळ शब्द नाहीत,
हे माझ्यासारख्या अनेकांच्या मनात साचलेल्या भावना आहेत.
त्यांनी जे गमावलं, त्यांची जेवढी रुखरुख आहे,
तेवढीच साक्षीही आहे
की, खरं मैत्र अजूनही अस्तित्वात होतं.

ते हरवलेलं असलं तरी,
त्याचं अस्तित्व "कधी कुठल्या गाण्यात,
कधी कुठल्या शांत संध्याकाळी,
कधी एखाद्या जुन्या चित्रात"
परत मनात जिवंत होतं.

 शेवटीया पुस्तकात तुझं प्रतिबिंब कुठेतरी असेलच.
शब्द माझे,

कथा सगळ्यांच्या.

जर हे वाचताना तू एकदा तरी थांबलास, विचार केला,
मग हे लेखन सफल झालं म्हण.


मैत्री बदलेली असली, तरी आठवणी अजूनही शाबूत आहेत.
आणि त्या विसरणं शक्यच नाही.


पुस्तक समाप्त.

"खरं मैत्री नाय राहिलंअनुभवातून उमजलेलं सत्य"

 

 




Writer- santosh Hadapad

Email-Santosh.hadapad88@gmail.com

 

 

About Author

About The Author Santosh Hadapad माझ्या बद्दल सांगावं इतकं काही फारसा मोठा व्यक्ती मी नाहीय,

जीवनात खूप काही चांगल्या आणि वाईट या दोन्ही गोष्टींच्या अनुभवातून खूप काही शिकलं,

आणि जीवन जगतांना अजूनही खूप काही शिकणारच आहे,

असो लिहिण्याबाबत फारसा काही बोलणार नाही, जसा मनापासून लिहू वाटतं ते लिहीत असतो, वेळ जसं मिळतं त्यातून कधी कविता तर कधी रोजनिशी असं चालू असतं,

वाचन आणि लेखन हे अशी गोष्ट जे फक्त माणूस हा प्राणी करू शकतो, तर खूप कमीच लोक आहेत जे वाचतात आणि लिहितात,

माझं अस मत आहे की, जेव्हा आपण एखादी गोष्ट बोलू नाही शकत, त्या वेळी लेखन खूपच मदत करत, ते कविता असो, किंवा रोजनिशी असो, बास इतकंच सांगायचं होतं..😊

 

मनात खोल कुठेतरी दडलेल्या त्या शब्दांसाठी,

ज्यांना बोलता येत नाही... पण ऐकवता येतं.

इथं शब्द असतातथोडेसे गोंधळलेले, थोडेसे स्पष्ट.

प्रेम, तुटलेपण, एकटेपणा, आशा, आणि स्वत्वाचा शोध

हे सगळं जे "कदाचित" मध्ये सामावलेलं असतं.

 

इथे तुमचं स्वतःला शोधायला यावं,

मनातले आवाज ऐकायला यावं,

आणि कधी बोलायचं मनात असूनही बोललेलं

ते वाचायला यावं.

 

 

 

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