आज सुबह सुबह संडे के दिन लेट उठने का दिन, जैसे डेली का रूटीन रहता है वैसे ही होगा ऐसे लगा था, पर जैसे मेसेज देखा तो मेरी एक फ्रेंड ने मुझे मेसेज किया था, "हैप्पी इंटरनेशनल मेन्स डे",
जैसे हर वक्त हर मर्द लोक किसी का बर्थडे, शादी की सालगिराह याद नही रख पाते, वैसे ये भी डे मुझे याद नही था,
कैसे याद रहेगा, इंसान के दिमाग में कुछ खाली रहेगा तोही इन सब बाकी चीजें याद में रखने के लिए समय मिलेगा,
जब घर में लड़का पैदा होता है तो पहले खुशी से पेढ़े बाटते थे, लेकिन उस लड़के को पता नहीं आगे जाकर उसकी जिंदगी में क्या क्या चीज़ से लड़ना है,
पता नही जब मैं पेहली बार क्लीन शेव किया था, तो सब मुझ पर हस रहे थे, शायद मर्द का मूछ से ही उसका मर्दाना साबित होता होगा ऐसे लगा मुझे, या फिर यही छभी होती होगी मर्द होनेंकी,
जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ती गई वैसे वैसे मुझे समझने लगा की लड़कियां भले ही ना सीखे उन्हें किसी को संभालना नही है, आपको आगे जाकर किसी लड़किको आपकों आगे जाकर संभालना है यही इसीलिए आपको खूब पढ़ लिखकर अच्छा नौकरी करो, और जितना अच्छा नौकरी पाओगे उतनी ही अच्छी लड़की आपको भविष्य में आप से शादी करेगी
तो एक बात तो क्लियर हुआ, बस लड़कों के ऊपर जिम्मेदारी का बोझ बचपन से ही डाला जाता है, तुम्हे आगे जाकर अपने मां बाप को संभालना है, अपनी बीवियोंकी जरुरते पूरे करने है, लेकिन ये कोई नही बताएंगे की बेटा आपके क्या सपने है?
वैसे सपने तो दम ही तोड़ देते है इतने सारे जिम्मेदारियों के वजह से, एडजस्टमेंट करना तो सब आदत से हो गई थी, हॉस्टल में जब बर्थडे पार्टी के लिए सब जाते थे, लेकिन मैं कुछ न कुछ बहाने करके टाल देता था, क्योंकि कंट्रीब्यूशन के लिए मेरे पास पैसे नहीं होते थे,
दिवाली के लिए कपड़े लेना भी इतनी जरूरत नहीं लगती थी, दोस्तो के साथ हैंगआउट करना भी छोड़ देता था, क्योंकि मैं अपना आर्थिक स्थिति को अपने दोस्तो के साथ भी शेयर नही कर पाता था,
Hero-honda या फिर एक्टिवा पे राइड करना मेरा भी सपना था, लेकिन हालाथ के सामने पैदल चलना ही एक विकल्प था,
कोई एक मेरी भी ड्रीम गर्ल हो ऐसे लगता था, लेकिन फटी जेब मुझे मेरी औकात के बाहर का सपना देखने से मना करता था, क्योंकि लड़कियोंके नखरे झेलने की मेरी औकात नही थी,
हालातों से लड़के मैंने एक अच्छा नौकरी पा लिया अब सोचा आगे जाकर सब ठीक हो जायेगा, समाज से नजर से अब मैं अपने पैर के ऊपर खड़ा था, अब मैं मेरी खुद की किस्मत बदलुंगा इसका उम्मीद था,
सोचा था नौकरी पाते ही मेरे खुद के सपनो के लिए वक्त दूंगा, लेकिन घर के खर्चे, जिमीदारियो के खर्चों में सैलरी मिलने के दो दिन में ही बैंक बैलेंस नील हो जाता था,
तब मुझे समझ में आया की कैसे बाबा सभ चीज़ कैसे मैनेज करते थे,
जरूरत और इतने से सैलरी में सरवाइव कैसे करते थे, शायद इसीलिए जब बाबा घर आते थे तो इतने शांत रहते थे, क्योंकि परिस्थितियों ने उनको शांत किया था।
आप लोगो को पता होगा औरतों से ज्यादा आदमियों को ज्यादा हर्ट अटैक ज्यादा होते है, क्योंकि लड़के कभी नही रोते ये बचपन से ही सीखाते है,
जब मैं अपने दोस्तो के बारे में सुनता हूं, उनकी शादियां नही हो रहे , रीजन कंडीशन,
१ लड़का पढ़ा लिखा हो,
२.खेत होना चाहिए (but लड़कियां खेत में काम नहीं करेगी)
३.१लाख महीने का तनखा हो
४.अकेला हो(भाई बहन नही हो)
५.उसे खाना पकाना आता हो
६.metro City me रहता हो और खुद का घर हो,
लड़की के बापको भी खुद का घर बनवाने में जिंदगी चली गई ये नही सोचेंगे,
७.अपने मां बाप के साथ नही रहना चाहिए।
८. Dowary(देहेज/हुंडा) नही लेना चाहिए,
बट इनडायरेक्टली यें सब दहेज ही है ना,
सबसे ज्यादा तो आदमीयोंकी तकलीफ तब बड़ जाती है , जब वो शादी करके अपने फैमिली के साथ रहता है,
मां कोसती है की बीवी के पल्लू में रहता है, और बीवी कहती है मां के पल्लू में रहता है, ऑफिस का टेंशन , घर में मां और बीवी कि झगड़े ये सब चीजें मैनेज कर कर के जिंदा रहते ही है, तभी बहन का या फिर मां का एनिवरसरी भूल जाए तो, उस पर भी सुनना पढ़ेगा को शादी के बाद भाई /बेटा बदल गया, सिर्फ बीवी के ही याद रहता है etc etc...
बस मुझे कहना है की मर्द को भी कभी कभी समझना चाहिए,
आप कभी एक बार उसको समझिएगा वो आपको आपसे दस गुना ज्यादा आपको समझेगा,
By the way,
This is my personal opinion, not targeting to any gender just exprssing my thoughts,
May be someone will aggree or someone will not.
हैप्पी इंटरनेशनल मेन्स डे।
@santoshhadapad
©संतोष हडपद
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